जकर्याह की पुस्तक - अध्ययन 👇
लेखन तिथि : जकर्याह की पुस्तक का 520और 470 ईसा पूर्व में लिखे जाने की सम्भावना पाई जाती है।
लेखन का उद्देश्य : जकर्याह ने जोर देकर कहा कि परमेश्वर उसके भविष्यद्वक्ताओं को उसके लोगों को शिक्षा, चेतावनी और सुधारने के लिए उपयोग करता है। दुर्भाग्य से, उन्होंने सुनने से इन्कार कर दिया है। उनके पाप परमेश्वर के दण्ड को ले आए हैं। पुस्तक साथ ही यह प्रमाण भी देती है, कि यहाँ तक भविष्द्वाणी भी भ्रष्टता से भरी हुई हो सकती है। इतिहास हमें दिखाता है, कि इस अवधि में की गई भविष्यद्वाणी को यहूदियों ने अस्वीकार कर दिया, परिणामस्वरूप यह दोनों नियमों के मध्य में ऐसा शान्त समय की ओर ले गया जब परमेश्वर के लोगों के लिए किभी भी तरह की कोई स्थाई भविष्यद्वाणी की आवाज नहीं सुनाई दी।
कुँजी वचन : जकर्याह 1:3, "इसलिये तू इन लोगों से कह: सेनाओं का यहोवा यों कहता है: 'तुम मेरी ओर फिरो,' सेनाओं के यहोवा की यही वाणी है, 'तब मैं तुम्हारी ओर फिरूँगा,' सेनाओं के यहोवा का यही वचन है।"
जकर्याह 7:13, "और सेनाओं के यहोवा का यह वचन है, 'जैसे मेरे पुकारने पर उन्होंने नहीं सुना, वैसे ही उनके पुकारने पर मैं भी न सुनूँगा।'"
जकर्याह 9:9, "हे सिय्योन बहुत ही मगन हो। हे यरूशलेम जयजयकार कर! क्योंकि तेरा राजा तेरे पास आएगा; वह धर्मी और उद्धार पाया हुआ है, वह दीन है, और गदहे पर वरन् गदही के बच्चे पर चढ़ा हुआ आएगा।"
जकर्याह 13:9, "उस तिहाई को मैं आग में डालकर ऐसा निर्मल करूँगा, जैसा रूपा निर्मल किया जाता है, और ऐसा जाँचूँगा जैसा सोना जाँचा जाता है। वे मुझ से प्रार्थना किया करेंगे, और मैं उनकी सुनूँगा। मैं उनके विषय में कहूँगा, 'ये मेरी प्रजा हैं,' और वे मेरे विषय में कहेंगे, 'यहोवा हमारा परमेश्वर है।'"
संक्षिप्त सार : जकर्याह की पुस्तक यह शिक्षा देती है, कि हो सकता है कि उद्धार सभों को प्राप्त हो जाए। अन्तिम अध्याय संसार के चारों से परमेश्वर की आराधना के लिए आने वाले लोगों को चित्रित करता है, जो यह चाहता है, कि सभी लोग उसके पीछे हो लें। यह सार्वभौमिकतावाद उद्धार का धर्मसिद्धान्त नहीं है, अर्थात्., कि सभी लोग इसलिये बचा लिए जाएँगे क्योंकि परमेश्वर का स्वभाव बचाने का है। इसकी अपेक्षा, पुस्तक यह शिक्षा देती है, कि परमेश्वर यह चाहता है, कि सभी लोग उसकी आराधना करें और जो ऐसा करते हैं, वह उन्हें उनकी जाति या राजनैतिक अभिव्यक्ति को एक ओर रखते हुए ग्रहण करता है, जैसा कि उनसे यहूदा और यरूशलेम को उनके राजनैतिक शत्रुओं से छुटकारा देने के समय किया था। अन्त में, जकर्याह यह उपदेश देता है, कि परमेश्वर इस संसार के ऊपर सर्वोच्च है, और उसके सामने कोई भी प्रतिमा नहीं टिक सकती है। उसके भविष्य के दर्शन यह संकेत देते हैं, कि परमेश्वर घटित होने वाली प्रत्येक घटना को देखता है। इस संसार में परमेश्वर के द्वारा हस्तक्षेप का चित्रण यह शिक्षा देता है, कि अन्त में वह मानवीय घटनाओं को अपने अनुसार समाप्ति पर ले आएगा। वह परमेश्वर का अनुसरण या विद्रोह करने के लिए एक व्यक्ति की व्यक्तिगत् स्वतंत्रता को हटा कर नहीं देता है, अपितु लोगों के द्वारा लिए हुए निर्णयों के लिए उन्हें ही उत्तरदायी ठहराता है। अन्तिम अध्याय में, यहाँ तक कि प्रकृति की शक्तियाँ भी परमेश्वर के नियंत्रण में होने की प्रतिक्रिया व्यक्त करती हैं।
प्रतिछाया : जकर्याह में यीशु मसीह और मसीह के युग के बारे में बहुतायत के साथ भविष्यद्वाणियाँ पाई जाती हैं। यह भविष्यद्वाणियाँ मसीह आएगा और हमारे मध्य में वास करेगा सम्बन्धी प्रतिज्ञाओं (जकर्याह 2:10-12; मत्ती 1:23) से आगे बढ़ते हुए डाली और पत्थर के प्रतीकों में आगे बढ़ते हुए (जकर्याह 3:8-9, 6:12-13; यशायाह 11:1; लूका 20:17-18) उसके दूसरे आगमन तक चली जाती हैं, जहाँ वे जिन्होंने उसे भेदा था, छाती पीट कर उसे देखते हुए विलाप करेंगे (जकर्याह 12:10; यूहन्ना 19:33-37), जकर्याह की पुस्तक का विषय मसीह है। यीशु ही इस्राएल का उद्धारकर्ता, एक ऐसा सोता है, जिसका लहू उन सभों को अपने में ढक देता है, जो उसके पास उद्धार के लिए आते हैं (जकर्याह 13:1; 1 यूहन्ना 1:7)।
व्यवहारिक शिक्षा : परमेश्वर आज हम से नैतिकता से भरा हुआ जीवन निष्ठा से भरी हुई आराधना की अपेक्षा करता है। जकर्याह का जातिय पूर्वाग्रह को तोड़ने का उदाहरण हमें अपने समाज के सभी क्षेत्रों तक पहुँचने का स्मरण दिलाता है। हमें सभी मूल के लोगों, भाषाओं, जातियों और संस्कृतियों के लोगों को उद्धार के लिए परमेश्वर के निमंत्रण को विस्तारित करना चाहिए। उद्धार केवल यीशु मसीह के द्वारा क्रूस से ही उपलब्ध होता है, जो हमारे स्थान पर हमारे पापों के प्रायश्चित के लिए मर गया। परन्तु यदि हम उसके बलिदान को अस्वीकार कर देते हैं, तब और कोई भी ऐसा बलिदान नहीं है, जिसके द्वारा हमारा मेल-मिलाप परमेश्वर के साथ हो सकता है। आकाश के नीचे और कोई भी नाम नहीं दिया गया है जिसके द्वारा हम उद्धार प्राप्त कर सकें (प्रेरितों के काम 4:12)। समय गवाँने का कोई लाभ नहीं; उद्धार का दिन आज ही है (2 कुरिन्थियों 6:2)।